Saturday, October 13, 2012

poem

जहाँ गया हूँ कि लोग शहर पूछते हैं, नाम पूछते हैं,
कोई बाज़ार है कि  हर शेह का यहाँ दाम पूछते  हैं

उनसे बात हो भी दिल की तो किस तरह,
मिले हैं जब भी तो कहो क्या है काम पूछते हैं

कहाँ भूल आये जीने का ढंग वो ,
कि लोग दिल के सौदे से पहले अंजाम पूछते हैं

इस क़दर तन्हा हुआ है ये सफ़र कि ,
मंजिल को छोड़ अब मुसाफ़िर , आराम पूछते हैं 

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 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...