Tuesday, June 14, 2011

तुम बिन

हम जो हर दम अपने दम से गए ,
कभी तेरे , कभी अपने गम से गए

गए उन तक जो पैगाम -ऐ -वफ़ा 
 मेरे ,
कभी ज़ख्म -ऐ -जिगर कभी चश्म -ऐ -नम से गए


गुज़रा है ये सफ़र यूँ भी तेरे बिन ,
चले कुछ दूर और थम से गए


तेरे साथ थी हयात धूप छाँव सी ,
बिन तेरे ये मौसम भी कुछ नम से गए

2 comments:

  1. wah wah dost, this is really good

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  2. tera har title poem kyun hota hai be ... change karo .. title to soch hi sakte ho

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 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...