बाकी कितने हैं सितम मेरे हिस्से इस जहाँ में ,
क्या से क्या हुए हम शहर -ऐ -बुतान में
मजबूरियां इस दिल -ए -नाकाम की ,
उतरी हैं उनकी चुप में , या अपनी ज़ुबां में
महफ़िल में वो छुपाते हैं नज़र मुझसे ,
माज़ी जिनका है शामिल मेरी दास्तान में
ना पूछिए कैसे रोके हैं खुद को हम ,
क़ैद कितने हैं तूफ़ान मेरी तर्ज़ -ऐ -बयान में ...
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