Tuesday, April 24, 2018

एहद

उन निगाहों से आज न जाने क्या फ़साने निकले ,
मुद्दतों पहले जो गुज़रे , वो ज़माने निकले ...

हवा पलट गयी एक किताब के पन्ने ,
और कुछ नहीं,  बस ज़ख्म पुराने निकले ...

वो शज़र जिसके गिरने पे बहुत रोये थे हम दोनों ,
फूल उसी के आज मेरे सिरहाने निकले ...

शब की देहलीज़ पर भोर ने फिर दस्तक दी,
दिन का क़र्ज़ था, परिंदे फिर से निभाने निकले ...

वो मेरे पैरों के आबले हों कि तेरी आँखों के आंसू ,
तमन्ना के हिस्से में क्या क्या न ख़ज़ाने निकले

1 comment:

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...