Thursday, October 8, 2015

निष्ठा

निष्ठा और प्रेम।  ये दोनो शब्द बहुत अलग मतलब रखते हैं। प्रेम के लिए पात्रता चाहिए। महबूब चाहिए , उसके लिए मेहबूबा चहिये। फिर valentine day , greeting cards और पता नहीं क्या क्या।  मगर जितनी दुनिया मैंने देखी है , समझी है उसमें निष्ठा ऐसा शब्द , ऐसा भाव है जिसे बाज़ार समझ नहीं पाया। लोग प्यार को पकड़ लिए।  प्यार की दुकानें खुल गयीं।  प्यार होटलों में , होस्टलों में , घरों में , greeting cards , facebook में , सब जगह मिलने लगा।  मगर निष्ठा , निष्ठा अछूती रही।
मेरी दुनिया की समझ बहुत भोथरी है।  इसलिए मैं ज़्यादा कुछ कह न  पाउँगा। मगर तीस सालों के अपने जीवन में मैंने निष्ठा को हमेशा प्रेम से ऊँचा जाना है। कारण ये है कि मुझे निष्ठा में पात्रता की ज़रूरत कभी नहीं महसूस हुई।  इसलिए निष्ठा प्रेम से इतर जान पड़ी। निष्ठा केवल समर्पण मांगती है , पात्रता नहीं।  निष्ठा को कारण नहीं चाहिए , उसे केवल विश्वास सींचता है। इसलिए निष्ठा दिमाग के खेल से नहीं उपजती। वो बेटी जैसी है - कोमल , निर्विकार , निष्कलंक।
आज लोग बहुत शोर करते हैं।  आस्था को गली देते हैं , अन्धविश्वास के खिलाफ खड़े हैं और नए मानव , नयी दुनिया को लाने के पीछे लगे हैं।  पत्थरों की पूजा को गाली  बना दिया गया है।  इंसान का जागना , उसकी सोच को जगाना बहुत ज़रूरी हो गया है। मगर इस सब कोलाहल के बीच मुझे लगता है हम कहीं कुछ भूल गये हैं। हमारा मंदिर जाना , सजदे करना , चर्च जाना , सब एक पागलपन की तरह , एक collective psychosis की तरह, देखा जाता है। मगर मुझे सच कुछ और दिखता है।
मैं हिन्दू हूँ , इसलिए सिर्फ मंदिरों की कह सकूंगा।  बचपन से मंदिर आता जाता रहा हूँ , पत्थरों के आगे हाथ जोड़ता रहा हूँ , मांगता रहा हूँ , शिकायत करता रहा हूँ , इस आस  से कि कोई सुनेगा।  पता नहीं कि कोई सुनता है या नहीं।  मगर फिर भी जात्ता हूँ।  मैंने बहुत से लोगों को करीब से देखा है। कुछ लोग ऐसे भी देखे जो उन बेजान पत्थरों के आगे फफक फफक के रोते थे और मैंने उनका रोना समझ नहीं पाता था।  सोचता था कि ये पत्थरों के सामने भला क्यों गिङगिङाने रोज़ पहुँच जाते हैं ?
ओर रोज़ इनके पास बहाने को इतने आंसू कहाँ से आते हैं।
मगर बहुत , बहुत सालों के बाद मुझे समझ आया।  अपने जीवन के कुछ निजी उतार चढाव मुझे सिखा  पाये कि की वे सब के सब अंधविश्वासी ,  या मूर्ख  नहीं  थे।  उन्हें पता था कि उनके आंसू पत्थरों के सामने गिर रहे हैं।  मगर उनके पास कहीं जाने को न था।  इसलिए वे यहाँ थे।  उनके लिए शायद बेजान पत्थर उनकी आखिरी आस थे।  उनके दुःख, उनके आंसुओं के अंतिम साक्षी।  इन अंधविश्वासियों में  कुछ  शायद ऐसे भी थे  जिनकी निष्ठा अनाथ हो गयी थी।  वो शायद परिणति थी।
निष्ठा का अनाथ हो जाना ही शायद निष्ठा की परिणति है।  ये पत्थर उस सांकल की आखिरी कड़ी हैं जिसे ये लोग अब भी कस  के पकड़े  हैं।
जिसके हिस्से से डोर का ये अंतिम छोर भी छूटा , तो वो शायद अंतिम मुक्ति होगी, या जाने अंतिम पतन भी।  मैं  नहीं जानता।
मुझे ये अभी जीना है।  क्या आप जानते हैं ?











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