रात ये इशारों में कुछ कहती रही ,
कोई हसरत रह रह के संवरती रही
एक तसव्वुर -ए -यार और ये चाँद भी ,
देहलीज़-ए -सेहर तक शम्मा जलती रही
इन परिंदों को है आसमान का खौफ बहुत ,
हसरत -ए -परवाज़ थी कि बस पलती रही
अंधेरों की गिरफ्त बढ़ती रही ख्याल पर
आसमान पिघलता रहा रात ढलती रही
कोई हसरत रह रह के संवरती रही
एक तसव्वुर -ए -यार और ये चाँद भी ,
देहलीज़-ए -सेहर तक शम्मा जलती रही
इन परिंदों को है आसमान का खौफ बहुत ,
हसरत -ए -परवाज़ थी कि बस पलती रही
अंधेरों की गिरफ्त बढ़ती रही ख्याल पर
आसमान पिघलता रहा रात ढलती रही
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