यूँ भी कभी आरज़ू बेक़रार होती है ,
निगाह जब आइने से शर्मसार होती है ...
किसी दम जो ज़ेहन से उतरे है ख़याल उनका ,
तब हमें भी फ़िक्र -ऐ -कारोबार होती है ....
नजीबों से हो भला हमें क्या वास्ता ,
अपनी तो हर बात ज़िक्र -ऐ -यार होती है ....
ले आई गर्दिश हमें ये किस मक़ाम तक ,
जीत भी अपनी जहाँ , एक हार होती है ....
गुज़रे कम ना इम्तेहान मुफ़्लिसी के लेकिन ,
कोई ज़िद है कि तबियत अब भी तैयार होती है .....
फिर फिर जायें क्यूँ उसी राह ऐ दिल ,
हर जुर्रत जहाँ बस एक इंतज़ार होती है ....
निगाह जब आइने से शर्मसार होती है ...
किसी दम जो ज़ेहन से उतरे है ख़याल उनका ,
तब हमें भी फ़िक्र -ऐ -कारोबार होती है ....
नजीबों से हो भला हमें क्या वास्ता ,
अपनी तो हर बात ज़िक्र -ऐ -यार होती है ....
ले आई गर्दिश हमें ये किस मक़ाम तक ,
जीत भी अपनी जहाँ , एक हार होती है ....
गुज़रे कम ना इम्तेहान मुफ़्लिसी के लेकिन ,
कोई ज़िद है कि तबियत अब भी तैयार होती है .....
फिर फिर जायें क्यूँ उसी राह ऐ दिल ,
हर जुर्रत जहाँ बस एक इंतज़ार होती है ....
very beautiful indeed....specially the last two lines...
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